अर्थराइटिस और प्राकृतिक चिकित्सा
जोड़ों का दर्द अर्थात ‘अर्थराइटिस’ अनेक नामों से जाना जाता है। कुछ वर्ष पहले तक, किसी नारी या पुरुष की मांसपेशी या गांठों में या दोनों में दर्द और सूजन होने पर उसका निदान रुमेटिज्म’ के रूप में, सूजन से मुक्त रुमेटिज्म, मांसपेशीय रुमेटिज्म तथा गांठों का रुमेटिज्म किया जाता था। पीठ के निचले भाग में उसी प्रकार का लक्षण हो तो उसका नामकरण ‘लूम्बेगो किया जाता था। सीने की मांसपेशियों के ‘रुमेटिज्म’ को प्लूरोडीनिया कहते थे। कभी-कभी उसे भ्रम से ‘प्लुरिसी’ समझ लिया जाता था। उसका अति तीव्र रूप ‘रुमेटिक ज्वर’ कहा जाता था। आज रुमेटिक रोग के अनेक प्रकार हैं जैसे लूम्बेगो, बर्साइटिस, शियाटिका आदि। गांठों का जीर्ण रुमेटिज्म कभी-कभी ठंड लगने के बाद का, तीव्र रुमेटिज्म या टॉसिलाइटिस के बाद का रूप है। जो लोग चालीस की उम्र पार कर चुके होते हैं उनमें प्रायः मोच या अन्य प्रकार से आहत होने के बाद अर्थराइटिस शुरू होता है। गांठ कष्टमुक्त नहीं हो पाती, बल्कि कड़ी और पीड़ादायक रह जाती है और परिणामत: अंग ही कमजोर हो जाता है। ऐसा शरीर ‘अर्थराइटिस के विकास के लिए अत्यन्त अनुकूल होता है। इस रूप में विकसित कष्ट को हम ट्रामेटिक अर्थराइटिस’ कह सकते हैं। अर्थराइटिस’ खेल-कूद में भाग लेने वालों को भी प्रायः हो जाता है, पर वस्तुतः गांठों पर पड़ने वाला यह बल पीड़ा का स्थान चुनने से अधिक कुछ नहीं करता। ‘अर्थराइटिस’ किसी भी मौसम में शुरू हो सकता है। पर वह अधिकांशतः सर्दी के मौसम में ही शुरू होता है। सर्दी की ठंडक ‘अर्थराइटिस के कष्ट को बढ़ा देती है। गरम देशों की अपेक्षा ठंडे देशों में अर्थराइटिस से पीड़ित अधिक लोग मिलेंगे।’ कारण- ठंड में घर के अंदर रहकर काम करना, ताजी हवा का अभाव, गरिष्ठ भोजन का मात्रा से अधिक खाना आदि है। ठंड के दिनों की चर्या में इनका बाहुल्य तो सर्वग्राह्य है। यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा कोई भी काम जो शक्ति का ह्रास करता हो और विजातीय द्रव्यों को शरीर से बाहर करने में अवरोध उत्पन्न करता हो, उसके लिए कारण-रूप होगा। सभी ‘रुमेटिक स्थितियों का कारण पहले शरीर में ‘यूरिक एसिड एकत्र होना माना जाता था। यह प्रोटीन के उपापचय का एक उत्पाद है। आज भी अनेक लोग हैं जो इस पुराने सिद्धान्त में ही आस्था रखते है। परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। ऐसे रोगी की कोशिका (कैपीलरी) में यूरिक एसिड के कुछ क्रिस्टल संचित हो सकते हैं। अतः वहीं कारण हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। यूरिक ऐसिड’ रुमेटिज्म का कारण है। इस मान्यता के फलस्वरूप यह विचार मान्य हुआ कि मांसाहार उसके होने में सहायक होता है। परंतु सत्य यह है कि अत्यधिक स्टार्च तथा सफेद चीनीके प्रयोग का बड़ा तीव्र प्रभाव इस रोग के विकास पर पड़ता है। हम मात्र किसी एक आदत पर अर्थराइटिस के कारण रूप होने का दोष नहीं मान सकते। हमारे दैनिक जीवन की ये आदतें और चीजें, जो दौर्बल्य-उत्पादक हों और विजातीय द्रव्य को बढ़ाती हो, कारण-रूप मानी जानी चाहिए। आदमी के शरीर में विजातीय द्रव्य का अत्यधिक भार ही उसे ‘अर्थराइटिस’ का शिकार बनाता है। बेमेल (कम्बिनेशन) वाला भोजन लेने के फलस्वरूप खाना ठीक-ठीक न पच पाने के कारण पेट और आंतों में खमीर उठता है। वस्तुतः भोजन ही अर्थराइटिस का बड़ा कारण है। ‘अर्थराइटिस’ के रोगियों से उनका पूर्व इतिहास पूछें, तो आपको मिलेगा कि सूजन आने की स्थिति से काफी पहले से अधिकांश को भोजन न पचने की शिकायत रही है। इसका परिणाम होता है- रोग का उद्भव। वह व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता है। विजातीय द्रव्यों को शरीर से निकालने वाले अंगों का कार्यभार बढ़ जाने और उसके बाद भी भोजन ठीक-ठीक न पच पाने से, चाहे वह आहार पदार्थों के गलत मेल के कारण हो या किसी अन्य कारणवश, जटिल रोग पैदा होते हैं। जब यकृत और गुर्दों पर विषों को बाहर निकालने की क्षमता से कहीं अधिक भार, खाना न पच पाने के कारण निरन्तर बढ़ता ही जाता है, तो उनके लिए रक्त और ऊतकों को अवचूषित विषों और कचड़े से मुक्त रखना असम्भव हो जाता है। ऊतकों और पाचन प्रणाली का टाक्सिक पदार्थों से लदना ही रोग है। भोजन न पचने के कारणों में मुख्य है - अपेक्षा से अधिक खाना, खाना खाते समय पानी पीते रहना, थके होने पर भी खाना खाना, श्रम-साध्य काम करने के तत्काल बाद भोजन करना, भावनात्मक दृष्टि से उद्वेलित स्थिति में भोजन करना, दो भोजन-कालों के बीच में भोजन करना, अपेक्षा से कम सोना और नशीली दवाएं लेना। शक्ति को कम करने वाले कारण हैं- कॉफी, चाय, चाकलेट, शराब, तम्बाकू, ऐंटासिड, सरदर्द की गोलियां, नींद लाने वाली गोलियां लेना आदि। ये चीजें भोजन के पचने में भी अवरोध उत्पन्न करती है और विजातीय द्रव्यों को पूरा-पूरा निकलने नहीं देती। अपेक्षा से अधिक श्रम करना, अधिक यौन सम्बंध, अधिक देर पानी में रहना आदि हर काम की अति व्यक्ति को कमजोर बनाती है। यह माना जाता है कि रुमेटिज्म दिल को भी कमजोर करता है। ‘रुमेटिक हार्ट’ के अधिकांश लोगों को बचपन में ‘रुमेटिक ज्वर हुआ रहता है। हम जानते हैं कि ‘सैलिसिलेट्स (एस्पिरीन) हृदय को हानि पहुंचाता है। फिर भी ‘रुमेटिक ज्वर’ तथा ‘अर्थराइटिस’ और कुछ हृदय-कष्ट में इसका प्रयोग धड़ल्ले से होता है।’ सर विलियन ओस्लर ने अपने जगत-विख्यात ग्रंथ ‘प्रिंसिपल्स एंड प्रैक्टिस ऑफ मेडिसिन’ में कहा है- ‘सैलिसिलेट्स’ (एक वर्ग की दवा समस्त तथाकथित ‘रुमेटिक’ रोगों के इलाज में प्रयुक्त होती है) व्यर्थ है। पीड़ा कम करने के अतिरिक्त उसका और कोई उपयोग नहीं है। न केवल चिकित्सा व्यवसाय में लगे लोग बल्कि दवा विक्रेताओं को भी यह कहते सुनेंगे कि ‘अर्थराइटिस की कोई दवा ही नहीं है। ‘अर्थराइटिस’ के रोगियों को जो भी दवाएं दी जाती हैं, वे सभी मात्र कष्ट कम करने की दृष्टि से दी जाती हैं। अब कोर्टिसोन’ का प्रचलन हो गया है, पर वह भी अपनी हानि दिखाये बिना नहीं रहने वाली है। प्राकृतिक उपचार अर्थराइटिस के रोगी को पहले अपने भोजन में फलों और तरकारियों की मात्रा बढ़ानी चाहिए क्योंकि सभी फल और सब्जियां क्षारीय है व अम्लता कम करती हैं। उसे एक सप्ताह तक प्रातः नाश्ते में अमरुद, खरबूजा, खीरा, ककड़ी आदि 250 ग्राम की मात्रा में लें तथा दोपहर शाम चोकरदार आटे की रोटी तथा 250 ग्राम सब्जी ले। तीसरे पहर यदि कुछ खाने की इच्छा हो तो मोसम्मी, गाजर, खीरा, ककड़ी आदि का 250 ग्राम रस लेना उत्तम रहेगा। एक सप्ताह इस आहार पर रहने के बाद, रोगी को 3-4 दिन केवल फल पर रहना चाहिए। उसके बाद 3-4 दिन का जल उपवास कर लेना चाहिए। उपवास काल में दिन भर में 1 या 2 नीबू का रस पानी में मिला कर लिया जा सकता है। उपवास के बाद 3 दिन फिर रसाहार करे और फिर धीरे-धीरे रोटी और फलों के आहार पर आ जाये। इस पूरे चिकित्सा-काल में एनिमा लेते रहें। यदि इस एक क्रम से पूर्ण स्वास्थ्य न प्राप्त हो, तो इसी आहार-क्रम की एक आवृत्ति और कर लेनी चाहिए। डॉ. विमल कुमार मोदी संचालक आरोग्य मंदिर गोरखपुर
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