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अपक्वाहार द्वारा आरोग्य

हम फलों को कुदरती रूप में ही खाना पसंद करते है। ककडी, मुली को हम अपने भोजन में स्वास्थ्य दृष्टि से नहीं किंतु स्वाद बढाने के लिए (कचूमर) को महत्व देते है। इसलिए एक ओर भरपूर पक्वाहार भी रहता है और उसमें कचुमर / सलाद को अपक्वाहार की तरह स्वाद और थाली की शोभा बढाने के लिए पसंद करते है तथा उसके कुदरती रूप को विकृत बना देते है क्योंकि हम उसमें नमक, मिर्च, चीनी, विनेगर, नींबू जैसे उत्तेजक तत्वों को मिला लेते हैं । शरीर स्वास्थय के लिए एक नींबू के रस का सर्वाधीक महत्व है। शरीर के गठन के अनुसार आहार संयोजन अर्थात किस प्रकार शरीर मे 73% जल का स्थान है, असीम अवकाश भी है और 27% से 30% पृथ्वी तत्व की मात्रा है। इसी प्रकार का संयोजन आहार में भी होना अनिवार्य है। आहार में 70 से 80% जल, असीम आकाश-प्रकाश और 30 या 20% पृथ्वी तत्व का स्थान अनिवार्य है। इतिहासकारों के अनुसार आरंभ से ही मनुष्य फलाहारी था। फलों में 70 से 90% जल तत्व रहता है। इनके उचित संयोजन से मनुष्य सुदीर्घ आयुष्य व स्वास्थ्य पा सकता है। जब हम सजीव सृष्टि पर दृष्टीपात करते हुए उसका दर्शन करने का प्रयत्न करते है, तब स्पष्ट भान होता है कि प्रत्येक सजीव तत्व में जल व आकाश तत्व की साम्यता है जो स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। हमारा शरीर कोटि कोटि सजीव कोषों (Cells) का प्राकृतीक तंत्र है। इन सजीव कोषों को भी अपना जीवन बनाये रखने के लिए एवं रोग से बचने के लिए जीवनशक्ति से भरपूर आहार की ही आवश्यकता है। अपक्वाहार जीवनशक्ति से ओतप्रोत आहार है। इसकी रचना शरीर रचना से साम्यता का संबंध रखती है तथा अपक्वाहार को आसानी से स्वीकार करके उसमे से जरूरी तत्व भी अच्छी तरह से प्राप्त कर सकता है। जबकि पक्वाहार में जब जल जलता है, तो उसके साथ जल में घुलनशील तत्व भी नष्ट हो जाते है। आहार में रहे हुए प्रोटीन और वसा के तत्व ठोस रूप में रूपांतरित हो जाते है व उनकी सुपाच्यता भी कम हो जाती है। हमें यह भी मालूम है कि कुदरत में कहीं भी घी, तेल, या कार्बोदित तत्व के घडे भरे हुए नहीं मिलते। जब भी पक्वाहार का उपयोग किया जाता है। उसे पचाने के लिए अतिरिक्त जल की माँग करता है। अन्यथा आगे चल कर एसिडिटी जैसे रोगों को जन्म देती है इस संदर्भ में एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फल सब्जीभाजी, सूखे मेवे आदि अपक्वाहार के रूप में खाए जा सकते है, किंतु अन्न-कदन्न कच्चे कैसे खाए जा सकते है। हम सब लोग आग से भोजन को पकाने में इतने अधिक अभ्यस्त हो चुके है कि जल से पकाने की विधी का हमे विस्मरण हो गया है। मुलभूत रुप में आग एवं जल दोनों शक्ति के खजाने हैं। इन दो में मूलभूत अंतर बिलकूल नहीं है। हमारी दृष्टि, स्वाद और आदत ने अंतर पैदा कर दिया है। प्रत्येक तत्व जिस प्रकार आग से फूलता है, जल से भी फूलता है। फूलने में अंतर नहीं है। अन्न का प्रत्येक प्रकार दोनो रीति से सुपाच्य बनाया जा सकता है। आग से सुपाच्य बनाने की विधि से कुछ तत्व नष्ट हो जाते हैं जब कि जल से सुपाच्य बनाने की प्रक्रिया का प्रभाव ऐसा है कि अन्न और कदन्न में जीवन उत्पन्न होता है। अन्न-कदन्न को सादे जल में बरह घंटे तक भिगोना चाहिए और उसके बाद सूती वस्त्र में 24 से 48 घंटो तक खुली हवा में बांध के रखना चाहिए जिससे अन्न-कदन्न में अंकूर निकल आये। इन अंकूरो के रुप में जीवन ही उत्पन्न होता है। जिस प्रकार फसल में दाने कुदरती रूप में तैयार होते है, उसमें जल तत्व बढ़ जाता है, इससे उसका ऐसा स्वरुप बन जाता है कि शरीर के लिए वह सुग्राहय हो जाता है जिसमें विटामिन्स, खनीज तत्व तथा विकेंन्द्रित सुपाच्य प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट्स का संयोजन होता है। रासायनिक परीक्षणों के फलस्वरुप यह निष्कर्ष मिलता है कि खाद्यान्न को पकाने, सेकने, भुनने, तलने से उनमें व्याप्त विटामिन्स की हानि होती है, क्षारों में विकृतियाँ आ जाती है, वसा तथा प्रोटीन की सुपाच्यता कम जाती है। इस प्रकार पकाया गया आहार पाचनतंत्र के लिए एक बोझ बन जाता है, जिसकी सडाँध की प्रक्रिया शीघ्र शुरु हो जाती है। व्यक्ति पूर्णरूप से जागृत होते हुए भी स्वादेन्द्रिय के परवश हो कर अत्याहार कर लेता है, यह पक्वाहार से होने वाला सर्वाधिक भयंकर नुकसान है। शरीर की आवश्यकता से अधिक भोजन करने से कमजोरी का बीज पक्वाहार है। यह अत्याहार ही शरीर के लिए अत्याचार है। इससे कोई भी नहीं बच पाया है, चाहे वह शिक्षित है या अशिक्षित, ऊँच वर्ण का हो या नीच वर्ण का, साधु हो या असाधु, ज्ञानी हो या अज्ञानी आवश्यकता से अधिक आहार लेने का प्रयत्न करता है। परंतु जल से पकाये गये अपक्वाहार के स्वरूप में 70% जल रहता है। इस कारण वह शरीर के लिए बोझरुप नहीं बनता। विशेष प्रोटिन, वसा या कार्बोहाइड्रेट्स शरीर में इकठ्ठा हो नहीं पाता, क्योंकि अपक्वाहार विकेन्द्रित वसा-प्रोटीनवाला आहार है। अंतः अत्याहार का प्रश्न नहीं होता। पक्वाहार में चीनी-प्रोटीन तो होते ही है, फिर तला हुआ भोजन हो तो वसा भी शरीर में जमा हो जाती है। यह स्थिति स्वास्थ के लिए घातक है। शरीर की आवश्यकता से अधिक प्रोटीन हानिकारक है, क्योकि प्रोटीन निर्माणकर्ता है। मकान का निर्माण पूरा पूरा हो जाने के बाद भी यदि मकान के सामने पत्थर, इट जैसे सामान का ढेर लगा दिया जाय तो मकान का प्रवेशद्वार ही बंद हो जायेगा। कोई भी व्यक्ति ऐसे मकान का उपयोग नहीं कर सकता। ठीक इसी प्रकार शरीर की आवश्यकता से अधिक प्रोटीन दिया जाय, तो शरीर को उसका उपयोग करना ही मुश्किल हो जाएगा। एक बार जब शरीर का उचित निर्माण हो गया, तो फिर ह्रास की पूर्ति के लिए अपेक्षित हो, उतना ही प्रोटीन शरीर चाहता है। पक्वाहार लेने से इस प्रकार आवश्यक प्रोटीन के नापतौल पर नियंत्रण नहीं रह पाता। यह परंपरा जन्म से मृत्यू पर्यंत जारी रहती है। शरीर की आवश्यकताओं के प्रति हमारा व्यवहार उपोक्षापूर्ण होता है। मन की इच्छा ही महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका समाधान एक ही तरीके से संभव है। आहार में अपक्वाहार की मात्रा, उत्तरोत्तर बढाते जाना। ऐसा करने से हम अत्याहार के अत्याचार से अपनी रक्षा में बहुत अधिक सफल हो सकेंगे। डॉ. जितेन्द्र आर्य निदेशक हेल्थ नेचुरली

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